रांची। झारखंड की राजधानी रांची से करीब 30 किलोमीटर दूर मांडर प्रखंड का मुड़मा गांव हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा और द्वितीया तिथि को हजारों आदिवासियों का संगम स्थल बन जाता है। यहां आयोजित राजी पाड़हा मुड़मा जतरा मेला केवल एक धार्मिक या पारंपरिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की जनजातीय एकता और ऐतिहासिक सांस्कृतिक समझौते की जीवित परंपरा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मुंडा–उरांव का प्राचीन समझौता

आदिवासी इतिहास के जानकारों के अनुसार, करीब 1400 साल पहले मुंडा शासनकाल के दौरान उरांव जनजाति का रोहतासगढ़ (बिहार) से आगमन हुआ था। जब उरांव समुदाय इस क्षेत्र में पहुंचा, तो यह भूमि पहले से मुंडा आदिवासियों के अधिकार में थी।
कहते हैं कि शुरुआत में दोनों समुदायों के बीच क्षेत्रीय संघर्ष और अविश्वास की स्थिति बनी रही, क्योंकि आदिवासी समाजों में अपने क्षेत्र की सीमाओं की रक्षा की परंपरा गहरी रही है।
सुरक्षित जीवन और स्थायी आश्रय की तलाश में उरांव जनजाति ने तत्कालीन मुंडा राजा से शांति वार्ता की। लंबे संवाद के बाद मुंडाओं ने उरांवों को बसने की अनुमति दी, और दोनों समुदायों के बीच सांस्कृतिक व सामाजिक समझौता संपन्न हुआ। माना जाता है कि इस समझौते ने ही आगे चलकर छोटानागपुर की साझा जनजातीय संस्कृति की नींव रखी।
मुंडा “बड़े भाई”, उरांव “छोटे भाई”
मुंडा राजा द्वारा आश्रय दिए जाने के कारण उरांव समुदाय आज भी मुंडाओं को “बड़े भाई” का दर्जा देता है। उरांवों ने अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए राजा को मुड़मा स्थल पर आमंत्रित किया। यहां उनका भव्य स्वागत हुआ — नाच-गान, पारंपरिक प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसी ऐतिहासिक मिलन की स्मृति में हर वर्ष मुड़मा जतरा मनाई जाती है, जो भाईचारे, एकता और आभार की अभिव्यक्ति है।
सांस्कृतिक संगम और क्षेत्रीय भागीदारी
मुड़मा जतरा अब सिर्फ स्थानीय आयोजन नहीं रहा। इसमें झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी समुदाय शामिल होते हैं। इस दिन दूर-दराज़ में बसे उरांव और मुंडा परिवार भी शक्ति खूंटा स्थल पर एकत्रित होकर मां शक्ति की पूजा करते हैं।
यह उत्सव आदिवासी जीवन में आस्था, परंपरा और पहचान का प्रतीक बन चुका है।
सभ्यता से जुड़ी मान्यताएं
कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि मुड़मा जतरा की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता के सामुदायिक उत्सवों से जुड़ी हो सकती हैं, जिनमें प्रकृति, शक्ति और सामाजिक सामंजस्य का उत्सव मनाया जाता था।
आज का महत्त्व
मुड़मा जतरा सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि झारखंड के आदिवासी समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना का दर्पण है। यह स्थान लोककला, पारंपरिक संगीत, हस्तशिल्प और सामाजिक एकता का बड़ा मंच है।
आज भी यह जतरा इस बात का जीवंत प्रतीक है कि सदियों पहले हुए भाईचारे और सहयोग की भावना आज भी झारखंड की मिट्टी में जिंदा है — एक ऐसी भावना, जो विविधता में एकता का सबसे पुराना उदाहरण प्रस्तुत करती है।